Wednesday, April 13, 2011

श्री राम चालीसा एवं आरती


♥ श्री राम ♥ 




◄▓▓.•♥•.॥ श्रीराम जय राम जय जय राम॥.•♥•.▓▓►
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♥♥ श्री राम ♥♥¸.•*""*•.¸
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श्री रघुवीर भक्त हितकारी ।  सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।

निशिदिन ध्यान धरै जो कोई ।  ता सम भक्त और नहिं होई ।।



ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।  ब्रहृ इन्द्र पार नहिं पाहीं ।।


दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।  जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ।।


तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला ।  रावण मारि सुरन प्रतिपाला ।।


तुम अनाथ के नाथ गुंसाई ।  दीनन के हो सदा सहाई ।।


ब्रहादिक तव पारन पावैं ।  सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ।।


चारिउ वेद भरत हैं साखी ।  तुम भक्तन की लज्जा राखीं ।।


गुण गावत शारद मन माहीं ।  सुरपति ताको पार न पाहीं ।।


नाम तुम्हार लेत जो कोई ।  ता सम धन्य और नहिं होई ।।


राम नाम है अपरम्पारा ।  चारिहु वेदन जाहि पुकारा ।।


गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो ।  तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ।।


शेष रटत नित नाम तुम्हारा ।  महि को भार शीश पर धारा ।।


फूल समान रहत सो भारा ।  पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ।।


भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।  तासों कबहुं न रण में हारो ।।


नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा ।  सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ।।


लखन तुम्हारे आज्ञाकारी ।  सदा करत सन्तन रखवारी ।।


ताते रण जीते नहिं कोई ।  युद्घ जुरे यमहूं किन होई ।।


महालक्ष्मी धर अवतारा ।  सब विधि करत पाप को छारा ।।


सीता राम पुनीता गायो ।  भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ।।


घट सों प्रकट भई सो आई ।  जाको देखत चन्द्र लजाई ।।


सो तुमरे नित पांव पलोटत ।  नवो निद्घि चरणन में लोटत ।।


सिद्घि अठारह मंगलकारी ।  सो तुम पर जावै बलिहारी ।।


औरहु जो अनेक प्रभुताई ।  सो सीतापति तुमहिं बनाई ।।


इच्छा ते कोटिन संसारा ।  रचत न लागत पल की बारा ।।


जो तुम्हे चरणन चित लावै ।  ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ।।


जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा ।  नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा ।।


सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी ।  सत्य सनातन अन्तर्यामी ।।


सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।  सो निश्चय चारों फल पावै ।।


सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।  तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं ।।



सुनहु राम तुम तात हमारे ।  तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ।।


तुमहिं देव कुल देव हमारे ।  तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ।।





जो कुछ हो सो तुम ही राजा ।  जय जय जय प्रभु राखो लाजा ।।


राम आत्मा पोषण हारे ।  जय जय दशरथ राज दुलारे ।।


ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा ।  नमो नमो जय जगपति भूपा ।।


धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।  नाम तुम्हार हरत संतापा ।।



सत्य शुद्घ देवन मुख गाया ।  बजी दुन्दुभी शंख बजाया ।।


सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।  तुम ही हो हमरे तन मन धन ।।


याको पाठ करे जो कोई ।  ज्ञान प्रकट ताके उर होई ।।


आवागमन मिटै तिहि केरा ।  सत्य वचन माने शिर मेरा ।।


और आस मन में जो होई ।  मनवांछित फल पावे सोई ।।


तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै ।  तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ।।


साग पत्र सो भोग लगावै ।  सो नर सकल सिद्घता पावै ।।


अन्त समय रघुबरपुर जाई ।  जहां जन्म हरि भक्त कहाई ।।




श्री हरिदास कहै अरु गावै ।  सो बैकुण्ठ धाम को पावै ।।  
 
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सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय । हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय ।।

राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय । जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय ।।








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श्री राम.............................
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